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घुनघुटी बचाओ अभियान' को आंशिक सफलता ,एनजीटी ने सामाजिक कार्यकर्ता गजेंद्र परिहार की याचिका स्वीकारी, दिखाई सख्ती

 'घुनघुटी बचाओ अभियान' को आंशिक सफलता ,एनजीटी ने सामाजिक कार्यकर्ता गजेंद्र परिहार की याचिका स्वीकारी, दिखाई सख्ती




तबाही का खौफनाक षड्यंत्र: 15 कोयला खदानों की भेंट चढ़ेंगे लाखों एकड़ सघन जंगल, कटेंगे लाखों पेड़


बाघ-तेंदुए सहित संरक्षित वन्यजीवों के घर पर विनाश का साया: ट्रिब्यूनल ने वन मंत्रालय सहित कई विभागों को किया तलब


उमरिया जिले की सरहदों पर फैले सघन वनों और बाघों के सदियों पुराने रहवास को खदान माफियाओं की कुदृष्टि से बचाने के लिए 'घुनघुटी बचाओ अभियान' अब एक निर्णायक और विधिक जंग में तब्दील हो चुका है। इलाके में 15 नई कोयला खदानों का जो विनाशकारी चक्रव्यूह बुना जा रहा है, उस पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने कड़ा संज्ञान लिया है। आरटीआई एवं वाइल्डलाइफ कार्यकर्ता गजेंद्र सिंह परिहार द्वारा दाखिल याचिका पर अधिकरण ने मुहर लगाते हुए सुनवाई शुरू कर दी है। यदि इन खदानों की अनुमति पर रोक नहीं लगी, तो लाखों एकड़ की बेशकीमती वनभूमि हमेशा के लिए कोयले की राख में तब्दील हो जाएगी। इस महाविनाश की कीमत तीन दर्जन से अधिक बाघ और तेंदुओं को अपना घर और अस्तित्व खोकर चुकानी पड़ेगी।

शहडोल अंचल में दहशत का माहौल, गूंज रही विरोध की आवाज:

घुनघुटी के जंगलों के अंधाधुंध विनाश का सबसे भयानक और सीधा असर समूचे शहडोल अंचल के पर्यावरण, आबोहवा और जनजीवन पर पड़ेगा। विंध्य का फेफड़ा कहे जाने वाले इन जंगलों को बचाने की यह मुहिम इसी अंचल से शुरू की गई थी, जिसने अब एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले लिया है। वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता श्री परिहार द्वारा उठाई गई यह बुलंद आवाज अब शहडोल की सरहदों को पार कर सीधे दिल्ली-भोपाल में गूंज रही है, जिसमें शहडोल के युवाओं का भरपूर समर्थन मिल रहा है। जंगल और जीवनदायिनी नदियों के खात्मे की आशंका से स्थानीय निवासियों में भारी दहशत है, क्योंकि इसके बाद भयंकर प्रदूषण और जल संकट का सीधा दंश इसी क्षेत्र को झेलना पड़ेगा।

ट्रिब्यूनल का कड़ा रुख, वन मंत्रालय सहित इन विभागों को नोटिस

अंधाधुंध खनन के खिलाफ दायर इस अहम याचिका पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने सख्त रुख अख्तियार किया है। न्यायाधिकरण ने इस गंभीर पर्यावरणीय महाविनाश पर केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, राज्य वन विभाग और मुख्य वन्यजीव अभिरक्षक को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब तलब किया है। याचिकाकर्ता ने अपनी अपील में स्पष्ट किया है कि खदानों के कारण समूचा पारिस्थितिकी तंत्र और वन्यजीवों का रहवास पूरी तरह से तबाह हो जाएगा। एनजीटी द्वारा नोटिस जारी होने से भ्रष्ट तंत्र में भारी हड़कंप मच गया है, और प्रकृति को बचाने की इस मुहिम को एक बड़ी कानूनी ताकत मिली है।

बाघ गलियारे के मुहाने पर खदान, उड़ाई गई नियमों की धज्जियां

इस विवाद की जड़ में मारवाटोला स्थित रामा सीमेंट की खदान है, जिसके दस्तावेजों ने एक बड़ी धोखाधड़ी की पोल खोल दी है। आधिकारिक नक्शे प्रमाणित करते हैं कि यह खदान बाघ गलियारे से मात्र 53 मीटर की दूरी पर है। इसके बावजूद 1063 हेक्टेयर वनभूमि निगलने और 1.52 लाख पेड़ों को काटने की खौफनाक मंजूरी दे दी गई। वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए रात में खनन न करने के सख्त निर्देशों को दरकिनार किया गया और तीन प्राकृतिक जलधाराओं को मोड़ने का प्रस्ताव पास करा लिया गया। चौंकाने वाली बात यह है कि 2019 में बाघों के कारण ही यहाँ सटी हुई खदान का प्रस्ताव खारिज हो चुका है।  

विनाश की कतार में गंगा खनिज, जेके, बजरंग जैसी दिग्गज कंपनियां

जंगलों का यह कत्लेआम केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं रहने वाला है। घुनघुटी के इसी अति-संवेदनशील इलाके में गंगा खनिज, जेके सीमेंट और बजरंग इस्पात जैसी दिग्गज कंपनियां भी खदान आवंटन की कतार में खड़ी हैं। अगर इन 15 खदानों का जाल यहाँ बिछ गया, तो दुर्लभ वन्यजीवों का यह प्राकृतिक आश्रय स्थल हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। लगातार होने वाले भारी धमाकों, दैत्याकार मशीनों के शोर और प्राकृतिक जलस्रोतों के सूखने से बेजुबान जीव अपना घर छोड़ने को मजबूर हो जाएंगे। वाइल्डलाइफ कार्यकर्ता का स्पष्ट मानना है कि अगर इस अंधाधुंध कटाई को नहीं रोका गया, तो जंगल सिर्फ इतिहास बन जाएंगे।


मंडरा रहा मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा


पर्यावरण की इस भयानक तबाही को देखते हुए शहडोल अंचल के युवाओं, डिजिटल दुनिया के प्रभावशाली चेहरों और 'जेन-जी' (नई पीढ़ी) में खदानों को लेकर भारी आक्रोश भड़क उठा है। युवा वर्ग पूरे जोश के साथ इस मुहिम से जुड़कर अपना कड़ा विरोध दर्ज करा रहा है। सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर नमन राजपूत, प्राप्ती सोनी, संजीव बैगा, प्रबुद्धजन प्रत्यूष गौतम, आकाश पांडेय सहित अन्य सामने आ रहे हैं। पर्यावरण प्रेमियों को सबसे बड़ा डर इस बात का है कि जब बाघ और तेंदुए जैसे हिंसक जीव बेघर होंगे, तो वे पानी और भोजन की तलाश में मजबूरन गांवों में प्रवेश करेंगे। इससे पूरे इलाके में एक खूनी मानव-वन्यजीव संघर्ष जन्म लेगा, जिसका खामियाजा निर्दोष ग्रामीणों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ेगा। इसके अलावा शहडोल की शुद्ध हवा का केंद्र भी तबाह हो जायेगा।

इनका कहना है:

"हमारी यह जंग किसी एक व्यक्ति या संस्था तक सीमित नहीं है; इसमें शहडोल की युवा शक्ति, प्रबुद्ध वर्ग और 'जेन-जी' का पूरा समर्थन शामिल है। मैंने न्यायालयीन मोर्चे पर यह कदम सिर्फ इसलिए उठाया है ताकि इस विनाशकारी खतरे से समूचे अंचल को सचेत किया जा सके। 'घुनघुटी बचाओ अभियान' आज एक वृहद जनांदोलन बन चुका है। हमें यह भली-भांति समझना होगा कि बाघों की टेरिटरी और कॉरिडोर की रक्षा के बिना हमारा समूचा इको-सिस्टम ध्वस्त हो जाएगा, जिसका सीधा और घातक परिणाम हमें भयंकर गर्मी और अनिश्चित बारिश के रूप में झेलना पड़ेगा।"

- गजेंद्र सिंह परिहार

(एनजीटी अपीलकर्ता, आरटीआई एवं वाइल्डलाइफ एक्टिविस्ट)

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