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तीन मास्टर डिग्रीधारी नौकरी की जगह खेती एवं उद्यानिकी में चुनी अपनी राह

           सफलता की कहानी 


तीन मास्टर डिग्रीधारी नौकरी की जगह खेती एवं उद्यानिकी में चुनी अपनी राह

किसान पारसमणि ने नाम को किया सार्थक

जहां आमतौर पर युवा नौकरी की तलाश में शहरों का रुख करते हैं, वहीं शहडोल जिले के सुदूर वनांचल ग्राम टेंघा निवासी युवक पारसमणि सिंह ने पढ़ाई को ताकत बनाकर खेती में इतिहास रच दिया है। तीन-तीन मास्टर डिग्री जूलॉजी, इंग्लिश और कंप्यूटर साइंस में मास्टर डिग्री हासिल की है और वर्तमान में एमएसडब्ल्यू की पढ़ाई भी कर रहे हैं। नौकरी के पीछे भागने की बजाय पारसमणि ने जंगल के बीच हाईटेक हॉर्टिकल्चर फार्मिंग शुरू की और आज लाखों की कमाई कर रहे है।

पारसमणी सिंह (36 वर्ष) ने यह साबित कर दिया कि अगर सोच वैज्ञानिक हो और इरादे मजबूत हों, तो जंगल भी अवसर बन सकता है। 

पारसमणी सिंह करीब 10 से 15 साल तक अतिथि शिक्षक के रूप में अंग्रेजी विषय के शिक्षक का दायित्व निभाने के बाद उनका मन नौकरी में नहीं लगा। वे कुछ अलग करना चाहते थे। इसी सोच के साथ उन्होंने खेती को व्यवसाय के रूप में अपनाया और गांव में आधुनिक खेती का मॉडल खड़ा कर दिया। 

25 से 30 लोगों को रोजगार, 20-25 लाख का कारोबार

पारसमणी सिंह 15 से 20 एकड़ भूमि में व्यावसायिक सब्जी खेती कर रहे हैं। उनके फार्म में 25 से 30 स्थानीय लोगों को नियमित रोजगार मिला हुआ है। टमाटर, शिमला मिर्च, बैंगन, खीरा, भिंडी, बरबटी, गोभी, लौकी, तरोई, कद्दू के साथ-साथ नींबू और गेंदा फूल की खेती भी की जा रही है। गेंदा फूल से उन्हें दोहरा फायदा मिलता है अतिरिक्त आमदनी और कीट नियंत्रण भी होता है।

ड्रिप-मल्चिंग से बदली किस्मत

शुरुआत में दो साल तक संघर्ष भी रहा, लेकिन कृषि विज्ञान केंद्र और कृषि विभाग से मार्गदर्शन मिलने के बाद पारसमणी सिंह ने ड्रिप इरीगेशन और मल्चिंग जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाया। आज उनकी सब्जियां शहडोल तक सीमित नहीं, बल्कि अनूपपुर, बिलासपुर, अंबिकापुर और रायपुर की मंडियों तक पहुंच रही हैं।

सालाना 10 से 15 लाख की शुद्ध कमाई

हाईटेक खेती में सालाना 4-5 लाख रुपये की लागत के बाद भी पारसमणी सिंह 10 से 15 लाख रुपये तक की शुद्ध बचत कर लेते हैं। नर्सरी वे रायपुर और अंबिकापुर जैसी जगहों से मंगवाते हैं, जिससे गुणवत्ता बनी रहती है।

पारसमणी सिंह अब अपने खेती के रकबे को और बढ़ाने की योजना बना रहे हैं। उनकी यह सफलता कहानी न सिर्फ शहडोल, बल्कि पूरे प्रदेश के युवाओं के लिए प्रेरणा बन रही है।



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